सोमवार, 11 जुलाई 2016

धर्म और धार्मिकता पर हमारा चिन्तन

धर्म क्या है ?

ऐसे कार्य जो सामाजिक रूप से किसी को भी कष्ट न पहुचाते हों, धर्मकार्य कहलाते हैं।

अपने अपने समय में अनेक राजाओं, गुरुओं-महागुरुओं ने धर्म पर अपने-अपने विचार लिखें हैं।

समय बदलता है और धार्मिकता की परिभाषा में परिवर्तन होते रहता है।

परिवर्तन अर्थात् किसी को अपशब्द कहने के लिए धर्म का सुधार नहीं होता है।

आधुनिकता उसे ही कहते हैं जब पहले से कुछ परिवर्तन प्रतीत हो ।

धर्म में क्या सुधार होता है और क्या सुधार किया जाना चाहिए ?

धर्म में परम्पराओं एवं पाखंडो की विश्लेषण करके नैतिकता के आधार पर सुधार किया जाता है और यही होना भी चाहिए। यदि राजाओं, गुरुओं-महागुरुओं द्वारा समीक्षा कर यह सुधार नहीं किया गया तो पन्थों,जातियों एवं राष्ट्र के आधार पर धर्म का विभाजन प्रारम्भ हो जाता है।

जब भी सृष्टि की रचना हुई अथवा जबसे इस संसार में मानव आया तब एक दो ही आये और आज हम जितने मानव हैं सब का आधार किसी एक ही स्थान/बिन्दु से है।

किन्तु पन्थ के आधार पर जब धर्म विभाजित हो जाते हैं तो वे अपने सृष्टि की परिभाषएं भी बदल देते हैं।

जैसा कि आज का मुस्लिम कहता है कि वो आदम से पैदा हुआ है जबकि हिन्दू कहता है कि वह ब्रह्मा से जन्मा है तथा क्राइस्ट कहता है कि वो समुद्र के किसी जीव से जन्मा है।

इसलिए जो लोग भी अपने सृष्टि के बारे में जानना चाहेंगे उन्हें भ्रमित हो जाना पड़ता है।

ऐसे में मतभेदों को लेकर एक ही उपाय है। सभी पन्थों के गुरु-महागुरु एक भव्य सम्मेलन कर उचित नियमों का संकलन करें जिससे धर्म की परिभाषा पूर्ण हो सके। सबका ही सम्बन्ध धर्म से हो और कोई अधर्म से सम्बंधित न रह जाय।

बात जब भी धर्म की आती है तो मैं इस झूठ से कभी भी सहमत नहीं हो सकता कि "धर्म कई प्रकार के होते हैं।"

क्योंकि धर्म के मात्र दो ही प्रकार हैं, "धर्म" और "अधर्म" ।

भारतीय शुभचिंतक: अंगिरा प्रसाद मौर्य

"।।एकता में बल होता है।।"

#वन्दे_मातरम्

सोमवार, 30 नवंबर 2015

असहिष्णुता

जब किसी समाज में लोग अपने अधिकारों हेतु नहीं अपितु दूसरे के अधिकारों को छीनने हेतु संघर्षरत हों तो ऐसा समाज असहिष्णु समाज कहलाता है।

जब किसी व्यक्ति को बहुत प्रेम किया जाय, अधिक सम्मान मिल जाय, किन्तु वह इसे आदरपूर्वक लेने में लेने में सक्षम न हो, ऐसा ही व्यक्ति असहिष्णुता को जन्म देता है तथा उसके प्रचार में जुट जाता हैं।

------- अंगिरा प्रसाद मौर्य

सहिष्णुता

जब किसी समाज में लोग दूसरों के मान-सम्मान तथा उनके अधिकारों के चिन्ता इस प्रकार करते हों मानों उन्हें अपने अधिकारों का पता ही न हो तो ऐसे समाज को सहिष्णु समाज कहते हैं।

जब कोई व्यक्ति सम्पन्न होते हुए भी पास-पड़ोस के निर्धन/असहाय लोगों के अधिकारों हेतु संघर्ष करे तथा अपने सुखों को उनके साथ बाँटने का प्रयास करे तो वो व्यक्ति सहिष्णु कहलाता है।

--------- अंगिरा प्रसाद मौर्य

शनिवार, 2 मई 2015

न पक्षियों पे वार कर

आज कहीं पर फसल को हानि हो रही है तो कहीं पर भूकम्प आ जा रहा है, कहीं लोग आत्महत्या कर रहे हैं तो कहीं भूखो मर रहे हैं तो कोई आपदा से मर रहे हैं।  परंतु ईश्वर नहीं आता !
आखिर क्यूँ ????
कारण क्या है ?????

आखिर ईश्वर आये ही क्यूँ !!!!! कौन उसे बुलाना चाहता है !!!!! ईश्वर इतना सामर्थ्यवान है कि वह बिना आये भी सबका संहार कर सकता है।

आज इतनी घृणा है इतनी कटुताएँ हैं मानो मानवता जैसी कोई प्रवृत्ति ही नहीं होती ! ऐसे में ईश्वर से कौन स्नेह करने वाला है!!! ईश्वर का सत्कार कौन करने वाला है। आजकल तो लोग अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने हेतु ईश्वर का नाम लेते हैं। लोग तो केवल दिखाने के ईश्वर की स्तुति करते हैं ।

कोई भी सुखी संसार हेतु ईश्वर से कुछ मांगने वाला नहीं है। सब अपने-अपने स्वार्थों को साधने में लगे हैं। ऐसे में ईश्वर किसके लिए आएगा ???? ईश्वर का तो पूरा संसार है।

आपके समक्ष प्रस्तुत हैं इसी सन्दर्भ में हमारी कुछ काव्यगत पंक्तियाँ :-

संस्कार अब अपंग है !
सत्कार अब छिन गए!
अवतार है रुका हुआ !
करतार है छुपा हुआ !

दिन में न प्रकाश है,
न रात में विश्राम है।
धुंध सा आभास है,
विलाप है संग्राम है।

न वृक्ष का संहार कर,
न पक्षियों पे वार कर।
जंतु से है जग बना,
स्नेह तूँ अपार कर।

जीव पे उपकार कर,
तूँ बड़ा व्यापार कर।
अविनाशी तूँ धन जुटा,
आपदा से मार कर।

धर्म परोपकार है,
न धर्म का विनाश कर।
करतार क्यूँ ही आएगा!
अधर्म का प्रकाश कर!

लूट ले विश्वास को तूँ,
कपट का श्रृंगार कर ले,
कंश की भरमार होगी!
तूँ धरा पे राज कर ले !

देख उसकी गर्जना से,
काँप उठती है धरा !
एक जो प्रहार कर दे,
परिणाम में ये जग मरा।

अहम् में तो जग मुआ,
खोद न तूँ अब कुँआ !
"मौर्य" डर तूँ ईश को,
साध ले मनीष को।
~~~~~~~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्य

दिनाँक : 02/05/2015

सभी मानवों से हमारी यही विनती है कि आप ईश्वर से जब भी कुछ माँगना चाहें तो इस प्रकार विनती करें !
"हे ईश्वर ! हे परमेश्वर !
हमसे जाने-अन्जाने जो भी अपराध हुए हैं उसे क्षमा कर दो प्रभु !
हे महेश ! हे वृजेश !
हमें सद्ज्ञान दो प्रभू !
हमें सद्बुद्धि दो प्रभु !
हमारा मार्गदर्शन करो प्रभु !"

क्योंकि,
"बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले न भीख"

अर्थात्- यदि आप प्रत्यक्ष इच्छा नहीं व्यक्त करते हो तो ईश्वर आपको आपने अनुसार वो सबकुछ देगा जिससे आपका जीवन सुचारू रूप से चलता रहेगा और विश्व का भी कल्याण होगा।

जय श्री कृष्ण!
जय हिन्द !

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

रिंगटोन ringtone

जीवन का रिंगटोन तो तभी प्यारा बजता है,
जब लोग अपने लिये नहीं ! अपनों के लिए जीते हैं।
~~~~~~~~~APM

मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

अपनों का अभिमान बनों तुम

अभिमान अपने कंधों पर करना औरों के नहीं,
मरने के बाद कन्धा देते हैं लोग जीतेजी नहीं।
~~~~~~~~~APM

शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

श्री गणेश चतुर्थी पर सभी स्नेहियों को हार्दिक बधाई।

आइये आपको अवगत कराते हैं एक बहुत बड़े जाने मने फिल्म निर्माता रामगोपाल वर्मा जी के शुभकामनाओं वाली टिप्पणियों से /-
***
रामू ने अपनी टिवीट में कहा है कि जो बालक अपना सिर कटने से नहीं बचा सका, वह औरों को मरने से किस तरह बचा पाएगा। यह मेरा प्रश्न है? लेकिन, फिर भी सभी अंधभक्तों को हैप्पी गणपति डे।

रामू इतने पर ही नहीं रूके बल्कि उन्होंने आगे लिखा है, 'क्या कोई मुझे यह बता सकता है कि गणेश आज के दिन पैदा हुए थे या फिर आज के दिन उनका सिर काटा गया था?'

'क्या भगवान गणेश अपने हाथ से खाते हैं या अपने सूंड से?'
*********
ये मानसिकता है एक फिल्म निर्माता की,।
अगर इनके सामने कोई कह दे कि, "भला किसी का कर न सको तो बुरा किसी का मत करना, पुष्प नहीं बन सकते अगर तो काँटे बनकर मत रहना" । तो तुरंत कहेंगे कि सत्य है ऐसा ही होना चाहिए, मेरे अनुमान से लगभग सभी कहेंगे।
लेकिन फिल्म वाले ये सब नहीं स्वीकारते, वे केवल लोकलुभावानता हेतु ही ऐसा ऊपर से स्वीकारते हैं। उनका चले तो किसी का तो दूर की बात है सबके लिए काँटे बनकर ही चलेंगे ।
*******
एक बात कहता हूँ जो अति विचारणीय है।
कुत्ते भौंकते रह जाते हैं और हाथी दुम हिलाती चली जाती है। अर्थात आप सब इसे अन्यथा न लेकर अपने कार्यकर्म पर ध्यान दें, ऐसे अवरोधकों की क्या मजाल जो आपको अवरुद्ध कर सकें !
जय श्री गणेश
जय श्री गणेश
जय श्री गणेश

********
सभी ज्ञानियों से मेरा एक आग्रह और भी है कि यदि भविष्य को भाषित अथवा परिभाषित करना चाहते हैं तो आज ही फ़िल्में ना देखने का प्रण कर लो। अन्यथा इन अवरोधकों की मानसिकता और भी आपको अवरुद्ध कर सकती है।
ऐसी मानसिकता वाले व्यक्ति कभी भी समाजसुधारक नहीं हो सकते।
ऐसी मानसिकता वाले व्यक्ति समाज को दर्पण नहीं दिखाते अपितु धनों का शोषण करते हैं।
ऐसी मानसिकता वाले व्यक्ति संस्कारों को मिटाने का सौगंध उठा चुके हैं।
....
समय आ गया है !
आइये और अब हम सब मिलकर इन्हें मिटाने का सौगंध उठा लें। कोई भी फ़िल्में दूध की धोई नहीं हैं सबका बहिष्कार करें सबको देखना बंद कर दें।
कुछ ही महीनों में ये पूरा फिल्मजगत और सेंसर बोर्ड सड़कों पर भीख माँगता नजर आएगा।

भारतीय शुभचिन्तक - अंगिरा प्रसाद मौर्या।
Www.darpanjagat.blogspot.com

सहमत हैं तो अभी शेयर करें /- और सभी को सूचित करें /-
जय श्री गणेश
जय श्री गणेश
जय श्री गणेश

जनहितार्थ जारी /-
!!*!! वन्दे मातरम !!*!!