यह बहुत ही विचारणीय विषय है।
अंग्रेजी पढिके यद्यपि, सब गुण होत प्रवीन।
बिन निज भाषा ज्ञान के, रहत हीन के हीन।।
___ कविवर बिहारी जी।
यहाँ पर मेरा आशय संस्कृति एवं सामाजिक विकृति को लेकर है।
कौतुकता = विचित्रता = विलक्षणता
कौतुक:- जब किसी व्यक्ति अथवा वस्तु में विचित्र या सबसे अलग गुण पाए जाते हैं तो उसे कौतुक कहते हैं।
आज के लोग जिस कौतुकता को नैतिक समझ बैठते हैं ये भी एक कौतुकता ही है। बड़ी अचरज की बात है हम अपने आप को जाने बिना ही दूसरों को बखूबी जानने का प्रयत्न करने लगते हैं।
कुछ इसी के आधार पर बिहारी जी का आशय भी है। यदि हम अपनी मूल भाषा को छोड़कर दूसरी भाषा का उपयोग करने लगते हैं तो ये भी किसी विसंगति से कम नहीं है। भाषाओँ को जानना अत्यंत आवश्यक है किन्तु उसका उपयोग अथवा प्रयोग अत्यंत घातक भी है। जिस प्रकार अश्त्र-सश्त्रों से सुसज्जित रहना बहुत ही उत्तम है परन्तु उन्हें अपने परिवार के सदस्यों पर छोड़ना अथवा आँकना कुशिक्षा का ही प्रतीक है।
बहुत समय से और बहुत बार सुनकर मै ऊब चुका हूँ एक ही बात को,
मैंने कई बार कई श्रेष्ठों को देखा है कि बच्चों में आत्म-विश्वास जगाने हेतु उन्हें प्रोत्साहन देते हैं किन्तु साथ-साथ अपनी मातृभाषा और संस्कृति के लिए विष भी उगलते हैं। वे कहते हैं "मैं कर लूँगा" नहीं ! अपितु "आई कैन डू इट"। बड़ी विचित्र बात है, अंततः उसका अर्थ अथवा अनुवाद "मैं इसे कर सकता हूँ" ही होता है। जबकि सकता हूँ में संदेह भी है लेकिन लोगों के लिए आजकल यह एक आभूषण के समान हो गया है।
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हमारी अवस्था भी कुछ ऐसी ही है। लोग हमे देखते हैं तो हमारी आयु को देखते हुए बच्चा ही आँकते हैं, परन्तु यह हमारे लिए बहुत अच्छा भी रहा अभी तक। सिर्फ लोगों को आश्चर्य इससे होता है कि हम लड़के ठहरे और हमारे पास काम करने वाले 80 प्रतिसत लोगों की आयु हमसे ज्यादा होती है।
एक बार की बात है। एक धनिक का कार्यालय और प्रयोगशाला दोनों मिलाकर 600वर्गफुट था और वह दो महले का था। जिसको तोड़कर नए तरीके से बनाने हेतु हमने ठेका ले रखा था। वह डॉक्टर(धनिक) जब भी हमे देखता तो उसे संदेह हो जाता हमारी क्षमता पर। उसकी हमारी जब बात होती तो बात करने में मैं थोड़ा सुस्त पड़ जाता क्योंकि उसके ज्यादातर शब्द अंग्रेजी में ही होते थे। और कुछ क्षणों में जब मैं पूरा समझ लेता फिर जवाब देता। इससे वह और चकित हो जाता। एक दिन उसकी हमारी बात चल रही थी तब तक उसने भी यही कहा, "मौर्या जी, ऐसा नहीं आप पॉवर के साथ कहो "आइ कैन डू ईट" । हमने कहा, "जी"। उसने अपनी बात को फिर दुहराई, हमने हँसते हुए कहा, "जी ! हमे ऐसा कहने नहीं आता। उसे यह भी भलीभांति ज्ञात था कि सबलोग उसे गुड मोर्निग कहते थे और मै सदैव "नमस्ते" ही कहता था। किन्तु उसे यह भी ज्ञात था कि मै सिर्फ बोलता हिन्दी हूँ लेकिन जो कुछ लिखता हूँ सब अंग्रेजी में ही रहता है। वह मेरे व्योहार से काफी नाराज भी हुआ था और उसने पैसे कटौती भी की थी। किन्तु हमारे कर्मों से प्रेरित होकर वह आज भी हमारा सम्मान करता है, जिस प्रकार संसार में इतनी सारी भाषाएँ और भांति भाँति के संस्कृतियों के होते हुए भी हमारी भाषा और संस्कृति उसी प्रकार ऊँची है जिस प्रकार सभी चोटियों में एवरेस्ट।
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यह कहानी पता नही हमने क्यूँ लिख दी! शायद लिखना जरुरी भी रहा होगा। मूल विषय पर चलते हैं:-
आजकल मैं देखता हूँ कि लोग कोई भी चीज थोड़ा नया थोड़ा अलग देखते हैं उसके पीछे कतार लगा लेते हैं। वे उसकी विशेषताओं को कदापि नहीं समझना चाहते, वे ये भी नहीं जानना चाहते कि इससे हमारे और हमारे समाज में क्या क्या विडंबना हो सकती है ? उसे उठा लाते है। उसे धारण कर लेते हैं। उसे सर्वोपरि मान लेते हैं। वह भले ही समाज और संस्कृति के विरुद्ध हो, सही है क्योंकि वो तो हमारी एक अलग पहचान बनाती है।
जी हाँ ! आज केवल कहने के लिए ही लोग हम साथ साथ हैं अथवा साथ चलेंगे, वो भी चंद फिल्मों का अनुशरण करते हुए कहते हैं । सत्य तो यह है कि लोग अलग होना चाहते हैं, उनमे सदैव अलगाववाद ही पनपता है।
कारण है !
आज शिक्षा गौरव की नहीं पैसों की है। आज दर्पण-जगत सत्कार का नहीं व्यापर का है। आप कोई भी चीज देखेंगे पहले एक व्यक्ति लाता है, और यदि वह बुरी है तो धीरे धीरे पूरे गाँव वाले ले आते हैं। आप देखेंगे यदि एक व्यक्ति भागवत अथवा गीता जैसा पूण्य ग्रथ लाता है और पढ़ता है तो धीरे धीरे उससे दूर रहने को पूरा गाँव चिल्लाता है।
कारण है !
आज अक्षर या शब्द सिर्फ लिखे हुए हैं अथवा लिखने एवं पढ़ने के लिए ही हैं उसे स्वयं पंडित ही कहाँ अपनाता है।
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एक चूहे और लोमड़ी की बहुत घनिष्ट मित्रता थी। परन्तु वे सदा साथ नहीं रहते थे। उस जंगल में बिल्लियों की जनसंख्या कुछ ज्यादा ही थी। इसी कारण चूहा बहुत दुखी था। वह जब भी बिल से बाहर निकलता उसे कोई न कोई बिल्ली मिल जाती और तुरंत डर के मारे वह फिर अपने बिल में घुस जाता। एक दिन संध्या का समय था लोमड़ी ने उसे आवाज दिया और वह बिल से बाहर निकला। दोनों की हालचाल हुई। लोमड़ी ने अपनी प्रसन्नता भरी संवाद बताई और चूहे से उसके बारे में पूंछा। चूहे ने अपनी दुखभरी रामकहानी बताते हुए लोमड़ी से बिल्लियों के लिए उपाय पूँछा ! लोमड़ी ने कहा, " तुम उदबिलाव बन जाओ" , इससे बिल्ली के साथ साथ साँप भी तुमसे डरने लगेंगे। चूहे ने कहा बात तो ठीक है मित्र, पर उदबिलाव कैसे बना जाता है यह हमे नही मालूम। लोमड़ी ने कहा कि हमे उपाय बताना था सो बता दिया। अब यह तुम जानो कैसे बनना है यह तो तुम्हारी समस्या है कि तुम नहीं बन सकते। ठीक इसी तरह आज के गुरुजन भी हैं किताब की पूरी बातों को सिर्फ बाँचना ही उनका कर्तव्य है उसे अपने जीवन में वे क्यों लायें ! वे तो शिक्षक हैं फिर उनका शिक्षक कौन और कैसे हो सकता है वे क्यूँ किसी की मानें। वे तो कहते ही हैं कि बच्चों मृदु बोलो, अच्छा बनो, परोपकार ही सबसे बड़ा धर्म है। लेकिन ये सब कैसे बनना है कैसा धर्म है ये तो बच्चों की समस्या है।
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आज मैं देखता हूँ भारत में बहुत बड़े बड़े विचारक हैं। भारतीय संस्कृति एवं मातृभाषा को लेकर बहुत चिंतित हैं। किन्तु वो भी इस कौतुकता से नहीं बच पाते। परन्तु युवाओं की सोच अथवा समझ को गलत जरूर बता देते हैं। वे कहने को तो हिंदुस्तानी हैं किन्तु अंग्रेजी जरूर बोल जाते हैं।
एक और भी बड़ी कौतुकता समा चुकी है हमारे भारतवर्ष में । जो अध्यापक हिन्दी-विशेष विद्यालयों में शिक्षा प्रदान करते हैं, वे ये भी कहते हैं कि हमारी ही भाषा सबसे सबसे श्रेष्ठ भाषा है। लेकिन, अपने बच्चों को अंग्रेजी-विशेष के स्कूलों में भेज बड़ा ही गर्व महसूस करते हैं। ऐसी स्थिति में कैसे माना जा सकता है कि हमारी भाषा ही श्रेष्ठ भाषा है?
आज तो बहुत से लोग सिर्फ इसलिए अंग्रेजी बोलने लगे हैं क्योंकि इसीसे ही पता चल पाता है कि वे शिक्षित हैं। चाहे भले ही वे औवल कुशिक्षित हों।
कोई भी बुद्धिजीवी यदि थोड़ा सा विचार करेगा तो पायेगा कि अंग्रेजी एक रटन्त भाषा है। इसका कोई मोल अथवा तोल नहीं है। कुछ शब्द:- knowledge, sut, station, culture आदि ऐसे हैं जिन्हें लिखा कुछ और जाता है किन्तु जबरजस्ती पढ़ा कुछ और जाता है। आज इसका वर्चस्व जितना भी है वह कुछ इस प्रकार है;- जैसे - कोई गुणहीन अथवा अवगुणी व्यक्ति किसी राजा के घर जन्म ले लेता है और राजकुमार होने के नाते वह भी राजा बन जाता है। परन्तु एक गुणवान प्रजा है तो वह प्रजा ही रह जाता है। यह भी एक कौतुकता ही है।
लेकिन यदि ऐसा ही हमारे देश और भाषा के साथ भी हो तो पूरी की पूरी रुढिवादिता ही होगी। यह वैसा ही होगा जैसे कि भैंस यदि घास खाके दूध देती है तो हम भी वही घास खाने लगेंगे जिससे हम भी दूध देने लगेंगे और दोहरी फायदा होगी। दूध बेचकर भी कमा लेंगे और मेहनत कर तो कमाते ही हैं।
जी हाँ आजकल लोग ऐसा ही करते हैं एक ही वाक्य में आधे शब्द अंग्रेजी के होते हैं और आधे हिन्दी के।
आज यदि श्रेष्ठजन स्वयं को नहीं सुधार सकते तो युवाओं अथवा बच्चों को उनकी प्रवृत्ति एवं सोच के लिए दोषी बताने का उनका कोई अधिकार नहीं।
यदि आप चाहते हैं कि हमारी संस्कृति हमारे संस्कार अच्छे हों हिन्दी हों तो पहले पूर्ण हिंदी भाषी होना नितांत आवश्यक है। अन्यथा स्वयं भारतीय अथवा हिंदुस्तानी कहने का कोई अधिकार नहीं। और किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप करने का भी कोई अधिकार नहीं।
जिस मार्ग सबको ले जाना चाहते हैं पहले उसपर आप चलिए। अच्छा लगा तो हम भी चलेंगे। बहुत अच्छा रहा तो और भी आयेंगे। सबसे अच्छा रहा तो सब के सब आ जायेंगे। लेकिन आप दिशा-निर्देश कर किसी को भी नहीं ले जा सकते। क्योंकि यदि उसी मार्ग में लाभ है जिसे आप जानते हैं तो पहले आप क्यों नहीं जाते। दिशा-निर्देशन में क्यूँ व्यस्त हो गए अथवा भटक गए। अर्थात दिशा-निर्देश कर बुद्धू बनाने में ही पूरा लाभ है।
कितना कहें आसपास भी दूरदूर भी सब कौतुकता ही कौतुकता व्याप्त है जिसकी विशेषता कुछ भी नहीं उसे समझने को किसी के पास समय भी नहीं।
~~~ अंगिरा प्रसाद मौर्या।
!!*!! जय हिन्द !!*!! जय भारत !!*!!