शनिवार, 21 जून 2014

श्री प्रधानमंत्री जी की सोच और हमारा दृष्टिकोण

मैं श्री मोदी जी के अमूल्य विचार/निर्देश से पूर्ण सहमत हूँ की योजनाओं के नाम बदलने मात्र से योजनाएँ सफल नहीं हो जाती अपितु सत्ता पक्ष उसका क्रियान्वित कैसे करता है ये मायने रखता है।
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किसी जगह अथवा विशेष स्थल का नाम वहाँ के स्थानीय पुजनीयों के नाम से ही होने चाहिए, किसी पार्टी विशेष के पीढ़ियों से नहीं ।
उनकी यह बात भी हमको बहुत उत्तम लगती है।
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अब चलते हैं अपनी संस्कृति और सभ्यता की ओर :-
जिस देश की जो मूल भाषा होती है वहाँ के प्रत्येक व्यक्ति में उस भाषा के प्रत्येक शब्द के आशय अथवा अर्थ का तत्व विद्यमान होता है, चाहे वह भले ही कम पढ़ा लिखा अथवा अनपढ़ हो।
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जैसे हमारी हिन्दी के एक शब्द "रोचक" को ही ले लीजिये । इसका आशय क्या है? यह सभी हिंदी भाषियों को बिना बताये स्पष्ट हो जाता है इसमें संदेह नहीं किया जा सकता।
फ़िलहाल मुख्य विषय की चर्चा ज्यादा उचित होगी।
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ऐसी स्थिति में मैं समझता हूँ कि कोंग्रेस जो बदलाव भूल गयी थी, भारत को आजादी के बाद जो एक नया रूप देना भूल गयी थी, उसे श्री मोदी जी को करना चाहिए और इस प्रकार के छिपे बहुत से तत्वों पर विचार भी करना चाहिए। हमारा ऐसा मत है कि इससे भारत की सामाजिक स्थिति में काफी कुछ सुधार हो सकता है।
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हमारे यहाँ न्यायालय को कभी कोर्ट नहीं कहना चाहिए, क्योंकि इससे शिक्षा के क्षेत्र में जो आम व्यक्ति हैं उनको इसका आशय सपष्ट नहीं हो पाता।
हमारे यहाँ न्यायधीश अथवा दंडनायक को अभी तक भी जज कहा जाता है, इससे जज के शिक्षित होने की वजह से भले ही वह अपनी पदवी का आशय समझता हो परन्तु और व्यक्तियों के लिए इसका आशय स्पष्ट नहीं होता।
न्यायधीश को आर्डर-आर्डर की जगह उचित शब्द को प्रयोग में लाना चाहिए, जिससे लोग डर के मारे नहीं अपितु उनका कथन सुनके और उसका आशय समझके सावधान हों।
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हमारे यहाँ पुलिस को पुलिस नहीं अपितु रक्षक घोषित होना चाहिए, जिससे पुलिस को भी यह ज्ञात हो सके कि वे आरक्षी हैं, और जनता में भी उनसे डर के जगह लगाव उत्पन्न हो सके।
उनके कार्यालय अथवा गृह को कदापि पुलिस स्टेशन नहीं लिखना चाहिए अपितु उचित शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
अब लेख बहुत बड़ा हो रहा है अतः यहीं विराम देते हैं।
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!!*!! जय हिन्द !!*!! जय भारत !!*!!
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आपका शुभचिन्तक- अंगिरा प्रसाद मौर्या।

हमारी उन्नति और पतन के लिए जिम्मेदार हैं हमारे अपने विचार।

आज समाज में बलात्कार जैसे जघन्य अपराध अथवा पूरे देश को शर्मशार कर देने वाले अनैतिक आचार व्याप्त हो रहे हैं तो इसके जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ पुरुष ही कदापि नहीं हो सकते हैं, नारियाँ भी जिम्मेदार हैं और वे भी इसके साक्षी हैं।
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जिस प्रकार से एक हाथ से कभी ताली नहीं बज सकती, उसी प्रकार ऐसे किसी एक वर्ग विशेष द्वारा यह साध्य भी नहीं हो सकता।
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हमारे समाज में कई ऐसे बेशर्म औरतें और मर्द हैं, जिन्हें नियमों एवं सिद्धांतों का ज्ञान का समुचित ज्ञान भी है। लेकिन उन्हें एक नया/अद्भुत ज्ञान प्राप्त है- "बोध से जियो सिद्धांतों से नहीं"। हमारे अनुसार पश्चिम के लोगों के लिए यह ज्ञान बहुत ही लोकप्रिय रहा है। मैं ऐसे मनुष्य-कृत ज्ञान को ज्ञान को निर्मल कभी नहीं मान सकता । और यदि इसे कोई प्रवचनों में प्रयोग करता हो तो बेईमानी/छल समझता हूँ।
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यदि समाज अपना सुनहरा भविष्य चाहता हो तो सबसे पहले ऐसे अताताईयों(स्त्री/पुरुष) को उसके परिवार वालों को खुद दण्डित करना चाहिए, यदि वह परिवार का मुखिया है तो सामाजिक रूप से उसे दण्डित करना चाहिए।
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हमारे समाज में इसे खेल समझकर बहुत लोग ही इसे अंजाम दे रहे हैं। परन्तु जब गेहूँ के साथ घुन भी पिसा जा रहा है तब यह मामला सामने आ रहा है। जब किसी की बेटी अथवा बहन आदि इसके शिकार हो रहे हैं तब उनको यह ज्ञात हो रहा है कि यह अपराध है इसके लिए कड़े कदम उठाने चाहिए।
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और अब यदि जो महिलाएं हमारे इन बातों से असंतुष्ट हैं, उनके लिए हमें खेद है कि मैं उनके सामने खरा न आ सका।
मैं उनको अपनी तरफ से एक सुझाव भी देता हूँ कि यदि उनके आसपास यदि ऐसी कोई घटना घटती है तो उसके लिए रक्षादल(police) को शिकायत पहुँचाने से पहले ही लक्ष्मीबाई का रूप धारण करके कुछ महिलाएँ तुरंत ही दोषी पुरुष की हत्या कर दें !
पुरुषवर्ग खुद-ब-खुद डर जायेगा। और शायद बलात्कार रुक जाए।
आपका शुभचिन्तक -- अंगिरा प्रसाद मौर्या।

भीड़ का हिस्सा ! क्या आम आदमी वास्तव में कोई परिवर्तन ला सकता है? या बस करता रहेगा आरोप प्रत्यारोप?

-:भीड़:-
भीड़ तो कई प्रकार की होती है, कुछ जुटाई जाती हैं, कुछ बुलाई जाती हैं और कुछ खुद चल के आती हैं।
अब इनमे जो खुद चल के आती हैं उन्ही में हिस्सा(भीड़ का हिस्सा) हो सकता है। क्योंकि उसमे से प्रत्येक अपने अपने मतानुसार एकत्रित होते हैं। वे किसी एक विशेष प्रयोजन से नहीं होते।
जैसे- शादी की भीड़, सब शादी के प्रयोजन से ही होते हैं।
फिल्मों की भीड़, यहाँ सब फिल्मों के प्रयोजन से ही होते हैं।
चुनाव प्रचार हेतु अथवा सत्संग हेतु बुलायी गयी भीड़, यहाँ सब सुनने और सीखने के प्रयोजन से होते हैं।
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दुनियाँ की भीड़:-
यह एक बहुत बड़ी भीड़ है। यहाँ न तो कोई बुलाया गया है न तो कोई लाया गया है, सब के सब खुद अपनी जगह पर रहते हुए इस भीड़ का हिस्सा बने हुए हैं। इसी भीड़ में मैं भी हूँ और आप भी हैं। अर्थात प्रत्येक इस भीड़ का हिस्सा है। और सबके अपने-अपने स्थान हैं।
इसी में एक बहुत बड़ा स्थान आम आदमी का भी है।

क्या कर सकता है आम आदमी:-
हमारा मत है की आम आदमी कुछ नहीं कर सकता। वह जो कुछ भी करता है सब अपने लिए ही करता है, और अपने लिए करना कुछ न करने के बराबर है।
जैसे- एक परिवार में मुखिया को छोड़ सभी आम आदमी हैं, सब अपने लिए करते हैं किन्तु मुखिया/अभिभावक होने के नाते मुखिया सब के लिए सोचता करता है। यहाँ पर आज के समय में एक ही परिवार से कई लोग वहन/खर्च को लेकर अपनी अपनी जिम्मेदारियों पर कार्यरत हो सकते हैं, तो वे सब भी वहाँ पर आम आदमी नहीं हुए। सामूहिक मुखिया के रूप में उनका अपना-अपना स्थान होता है। बचे हुए बाकी आम आदमी।
अब बात आती है दुनियाँ के भीड़ की, देश के भीड़ की।
यहाँ पर भी जो सिर्फ अपने परिवार के लिए करता है वह भी कुछ नहीं करता है, वही है आम आदमी।
जिसे यह ज्ञात होता है कि हम केवल परिवार से नहीं अपितु समाज एवं देश से भी हैं तो वह अपने परिवार में ही देशहित हेतु प्रेरणाएँ देता है, देश पर मर-मिटने हेतु हौंसले बुलंद करता है, समाज को साफ़ सुथरा रखने हेतु कड़े कदम उठता है।  वह आम आदमी नहीं होता, वह खास आदमी होता है।
किसी घटनास्थल पर एकत्रित आम आदमी की पूरी की पूरी भीड़ भी कुछ नहीं कर सकती जब तक वहाँ कोई खास आदमी नहीं होगा ।
आम आदमी कुछ नहीं कर सकता,परन्तु आम आदमियों का समूह बहुत कुछ कर सकता है।
जरूरत है नेतृत्व की, और नेतृत्व एक खास आदमी ही कर सकता है। जरूरत है दयानंद की, जरूरत है विवेकानंद की, जरूरत सुभाष की ।
ऐसे कृत्य करने वाले नाम तो बहुत हैं, किन्तु हमने सार्थक नामों को ही दिया।
दयानंद= दया करने में ही जिन्हें आनंद मिलता हो।
विवेकानंद= विवेक ही जिनका आनंद हो, अर्थात कर्तव्य पथ से कभी न हटने वाला।
सुभाष = जिनसे सुभ की ही प्रत्येक को आशा हो।
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आरोप प्रत्यारोप :-
आम आदमी के आरोप-प्रत्यारोप से कुछ नहीं होने वाला, जब तक कि वह अपने आप को खास आदमी नहीं बना लेता, एक व्यापक समूह नहीं तैयार कर लेता। झूठी झलक में पद्स्थित इन सत्ता के अधिकारियों को, नेतृत्वहीनों को और नेत्रहीनों को जब तक सत्ताविहीन नहीं कर देता।
हमारा यह लेख यहीं पूरा हुआ।
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अब यदि कोई कहे कि मोदी जी को आम आदमी ने जिताया तो यह गलत है। मोदी जी को उनके नेतृत्व ने जिताया। मोदी जी को उनके व्यापक समूह ने जिताया। मोदी जी में बैठे सुभाष, गुजरात के विकास ने जिताया।