मंगलवार, 22 जुलाई 2014

दम घुटता है मेरा अब वक्त की कसौटी में जानें क्या अभी इसे मुझसे लेना बाकी है हँसी क्या होता है अब जैसे भूल गया हूँ शायद अभी आखों में आँसू देना बाकी है . कुछ पल का ही साथ था हँसी लम्हों से अकेले ही तय करना ये सफर बाकी है धूमिल है जिंदगी के आइनें में खुशियाँ अब तो केवल दर्पण का टूटना बाकी है . काव्य संकलन www.merikavywali.blogspot.com जगदीश पांडेय " दीश " .


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