दम घुटता है मेरा अब वक्त की कसौटी में
जानें क्या अभी इसे मुझसे लेना बाकी है
हँसी क्या होता है अब जैसे भूल गया हूँ
शायद अभी आखों में आँसू देना बाकी है
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कुछ पल का ही साथ था हँसी लम्हों से
अकेले ही तय करना ये सफर बाकी है
धूमिल है जिंदगी के आइनें में खुशियाँ
अब तो केवल दर्पण का टूटना बाकी है
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काव्य संकलन
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जगदीश पांडेय " दीश "
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