रविवार, 13 जुलाई 2014

. है चाह यही सब लोंगो की कि लेखनी से श्रृंगार लिखूँ मैं किसी युवती से प्रेम विवश हो प्यार अपना विस्तार लिखूँ मैं मृगनयनी गजगामिनी सी सुंदर रूप अपार लिखूँ मैं लेकिन टूट गई मेरी लेखनी जैसे घायल हो कोई शेरनी गुस्सा कर वो मुझसे बोली चली है माँ के सीनें में गोली बेटे तो कुछ नही करते हैं चुप चाप हो सब सहते हैं बदले काया भारत की अब ऐसा कुछ अंगार लिखूँ मैं शहीद हो गये देश पर जो शहीदों का आभार लिखूँ मैं न्योछावर हुवे देश की खातिर उनके स्वप्न को साकार लिखूँ मैं बदले काया भारत की अब ऐसा कुछ अंगार लिखूँ मैं ................... काव्य संकलन ॥ मेरी कविता ॥ ............................... जगदीश पांडेय "दीश " .


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